दहेज

🌹🌹  नतीजा दहेज के 🌹🌹

बहुते उछाह से बियाह कइली बेटा के ,
      अवते पतोह मोह लिहलस छन में ।
अँखिया के आस नाश सरधा के भइल ,
      मन के मुराद मोरा मरी गईले मन में ।।
चितबदला के जड़ी खर दिन के पियाई के ,
       मति भरमईलस मोरा सरवन के ।
पनिया पढ़ोड़ के पतोहिया पिअलस ,
       घुमवल हमरा बचवा के मन के ।।
   

बेटवा पतोह रहे दिने रानी घरवे में ,
     एके दरे बईठे से धँसली ई धरती
    दर्शन के तरसे ल सूरुज भगवान रोजे
      चाँद छछनत बाटे रुपवा निहरती ।।
सोची सोची सास दिन रात दुबरात बाड़ी ,
     कहियो पतोह भोरे अँगना बहरती ।
दिनभर के थाकल रतिया में सुते बेरी ,
     मलिया मे तेल ले के पकरा पे धरती ।।

पढ़ल पतोह बिया दिआ अस जरतिया ,
    घर में अँजोर नाही अगिये लगावेले ।
बिया अपने मन के बहुत बन ठन के ,
      बइठल घर में से कहना अढ़ावेले ।।
बेड टी ले आव सासु भोजनों बनाव हाली ,
      देरी कबो होखेला त अँखिये देखावेले ।
रोजे बने निक नोहर तबो कहे लेजा
    होहर , हाथे थारी टारी मुँह बिजुकावेले ।।

पतोह के जवाब

तोहरे बेटा से कम पढ़ले न बानी हम ,
      तबो लिहलु खर्चा तू जोड़ी के पढ़ाई के ।
रोपेया दहेज के तू रखलू सहेज के ,
      परिछलू पतोह सासु बहूते धधाई के ।।
देले बानी दाम हम कबो ना करब काम ,
        असुल करब सब तोहके खटाई के ।
जबले दहेज रही असहीं पतोह करी ,
       साँच कहे अनगढ़ सभे समुझाई के ।।

अनगढ़

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