सरस्वती वंदना

शारदा का साथ मुझे मिला जिस दिन से है ,
     नवीन नवीन शब्द आते मेरे मुख से ।
और कोई सुख नहीं मिले मुझे गम नही ,
      जिंदगी आनंद से है भरा इस सुख से ।।
शारदा का साथ और जिंदगी आबाद है तो ,
       जंग जीत लेंगे लड़कर हर दुख से ।
कलम चलाते हुए जिंदगी गुजर जाए ,
       मन नहीं  भरे मेरा लिखने की भूख से ।।


नित नव गीत छंद बंद लिखता हूँ मातु ,
         रात दिन तेरे गुण गान हम गाते हैं ।
तेरी हीं कृपा से भाव नए नए जगते हैं ,
        देती जो आदेश वही हम लिख पाते हैं ।।
शब्द भाव या विचार जगते जो मन में हैं ,
        जब तुम चाहती हो तब हींं ये आते हैं ।
अपनी कृपा हे मातु मुझपे बनाए रखो ,
         तेरे दिए ज्ञान को हीं लिखते सुनाते हैं।।


हम हैं अबोध बोध नहीं शब्द भाव के हैं ,
        तुम आके सोई हुई भावना जगाती हो ।
छंदशास्त्र अलंकार का है नहीं ज्ञान मुझे ,
        आके तुम सपने में पिंगल पढ़ाती हो ।।
इतना अधिक मुझे चाहती हो मातु मेरी ,
         ज्ञान रूपी धन मेरे घर पहुँचाती हो ।
यह ज्ञान धन पाके हो जाता हूँ मैं विभोर ,
        भूलता हूँ शब्द कोई आके तू बताती हो।

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