शबाब

शबाब वैसा भी किस काम का ,
जिसने कईयो को बीमार न किया ।

उस साकी को साकी भी क्या कहना ,
जिसने शराबी को गिरफ्तार न किया ।

अख्तियार उनको नहीं जिंदादिल कहलाने का ,
जिसने खामोशी को बाजार न किया ।

वैसे यादों का न आना बेहतर है,
जिसने तन्हाई को गुलजार न किया ।

आशिक़ी उनकी अश्कों में बदल जाती है,
जिसने जमाने को ख़बरदार न किया ।

यारों उनका बेकार है जीना ,
जिसने ज़िंदगी में इंतज़ार न किया ।

अज्ञात

अनगढ़ द्वारा संकलित

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