अदालत

जालिम जमाना जब जुल्म करता है कभी,
अविरल आँसू  और रक्त धार बहता।

आशा रूपी द्वार सभी बन्द दिखते हैं जब,
तब सिर्फ़ आसरा अदालत का रहता।।

अगर अदालत नहीं होता इस विश्व में,
तो पाप का बोझ नहीं शेषनाग सहता ।

न्याय का ये मंदिर है जज इसके देवता,
फ़ैसला सुनाते हैं जो न्याय शास्त्र कहता ।।

2…लेकिन अफ़सोस अब न्याय पाना मुश्किल है,
जहाँ पैसा पैरवी का लगता बाजार है।

इन साधनो से हीन दीन होके जाने पर ,
न्याय पाने की उम्मीद करना बेकार है।।

न्याय का ये मंदिर भी दूषित जब हो गया ,
तो समाज का सुधार होना निराधार है।

जो समाज को सुधारते हैं कब सुधरेंगे,
मुझे उस दिन का बहुत इन्तजार है।।

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