चारा खाने की सजा ,भुगते बारम्बार ।
फिर भी पशु का शाप कुछ ,छूट जाता उधार ।।
छूट जाता उधार ,करते नहीं भरपाई ।
लालु पीटे कपार ,पीछे पड़े भजपाई ।।
कह अनगढ़ कविराय ,लालु आ गए दुबारा ।
पुत्र मिट्टी खाए ,लालु खाऐंगे चारा ।।
अनगढ़
फिर भी पशु का शाप कुछ ,छूट जाता उधार ।।
छूट जाता उधार ,करते नहीं भरपाई ।
लालु पीटे कपार ,पीछे पड़े भजपाई ।।
कह अनगढ़ कविराय ,लालु आ गए दुबारा ।
पुत्र मिट्टी खाए ,लालु खाऐंगे चारा ।।
अनगढ़
Comments
Post a Comment