रुप


🌹🌹रुप 🌹🌹

रुप के पुजारी नर खुलकर कह लेते ,
        दर्दे दिल नारी कभी कह नही पाती है ।
दर्द जो भी मिले उसे हँसकर सह लेती ,
         होंठ पर उफ़ शब्द तक नही लाती है ।।
भाग्य के भरोसे नारी अपने को सौंपकर ,
       आँख बंद कर निज माँग भरवाती है।
दिली अरमान नारी दिल में दफन कर ,
        जो भी मिल जाए काम उसी से चलाती है ।।


शरीर तक सीमित नही रहती है नारी ,
        अपने पति को निज दिल में बसाती है ।
अनेक अत्याचार नारी सहती है पति का 
        फिर भी पति के लिए आँचल बिछाती है ।।
पति परमेश्वर के कुशल क्षेम के लिए ,
       व्रत कर नारी देवी देवता मनाती है ।
गवाह इतिहास है पतिव्रता नारी यहाँ ,
         काल से भी लड़ के पति को छीन लाती है ।।


रुप के आधार पर मापतौल नही करें ,
       रुप सिर्फ चार दिन की चाँदनी दिखाती है ।
रुपवती नारियों के नखरे हजार होते ,
       गुणवती नारी सारी उम्र भर निभाती है ।।
रुप को किनार कर गुण मेरा देखकर ,
         तब आप कहें कमी कहाँ नजर आती है ।
गुण छोड़कर दोष देखने से अनगढ़ ,
       लोगों को अपनी पत्नी से नही पट पाती है ।।


अनगढ़

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