आज राजनीति किसी गणिका से कम नहीं ,
देखने में सुंदर चरित्र से घिनौना है ।
घोटाला के मकान में फरेब के पलंग पे ,
रुपया रजाई और झूठ का बिछौना है।।
काले केश कलंक के मयंक से हैं लिपटे ,
धन और बल दोनों कान के तरौना हैं ।
लोगों को फँसाती है ये शब्द जाल फेंक कर ,
औ पूरा देश इसके हाथ का खिलौना है ।।
हिकारती नजर से गरीबों को ये देखती ,
और धनवान हेतु आँचल बिछाती है ।
सिर्फ धनवानों के इशारों पर नाचती ये ,
होटलों में बैठ कर जाम टकराती है ।।
ये अपने शागिर्द का ख्याल बड़ी करती है ,
खुद बदनाम होके इनको बचाती है ।
चुनाव के लगन मे ये गाँव गाँव घुम के ,
खुद नाचती है और सबको नचाती है ।।
बहुत बेशर्म होती बेवफा ये राजनीति ,
उम्र भर साथ नहीं किसी का निभाती है ।
किसी के दो बाँहों मे ये बँधकर रही नहीं ,
आज किसी के ये कल किसी के हो जाती है ।।
साथ जिसका देती उसे शिखर पर ले जाती ,
और साथ छोड़ते हीं धूल भी चटाती है ।
भोले भाले लोग कभी फँसते हैं जाल में तो
अनगढ़ राजनीति भीख भी मँगाती है ।।
लोकनाथ तिवारी अनगढ़
देखने में सुंदर चरित्र से घिनौना है ।
घोटाला के मकान में फरेब के पलंग पे ,
रुपया रजाई और झूठ का बिछौना है।।
काले केश कलंक के मयंक से हैं लिपटे ,
धन और बल दोनों कान के तरौना हैं ।
लोगों को फँसाती है ये शब्द जाल फेंक कर ,
औ पूरा देश इसके हाथ का खिलौना है ।।
हिकारती नजर से गरीबों को ये देखती ,
और धनवान हेतु आँचल बिछाती है ।
सिर्फ धनवानों के इशारों पर नाचती ये ,
होटलों में बैठ कर जाम टकराती है ।।
ये अपने शागिर्द का ख्याल बड़ी करती है ,
खुद बदनाम होके इनको बचाती है ।
चुनाव के लगन मे ये गाँव गाँव घुम के ,
खुद नाचती है और सबको नचाती है ।।
बहुत बेशर्म होती बेवफा ये राजनीति ,
उम्र भर साथ नहीं किसी का निभाती है ।
किसी के दो बाँहों मे ये बँधकर रही नहीं ,
आज किसी के ये कल किसी के हो जाती है ।।
साथ जिसका देती उसे शिखर पर ले जाती ,
और साथ छोड़ते हीं धूल भी चटाती है ।
भोले भाले लोग कभी फँसते हैं जाल में तो
अनगढ़ राजनीति भीख भी मँगाती है ।।
लोकनाथ तिवारी अनगढ़
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