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लावनी छंद
1 , ब्रह्म कमंडल से चल करके , धरती पर जब आई थी ।
झूम उठा था पर्वत मंडल , वन में बजी बधाई थी ।।
हिम तनया को पाकर हिम का , मान बढ़ा देवालय में ।
कलकल निनाद करती थी जब , गंगा गोद हिमालय में ।।
2 , धवल धाम के हर एक कण को , गंगा पावन करती थी ।
सब तीरथ के पुण्य बढ़ाती , पाप धरा के हरती थी ।।
जहाँ - जहाँ से जाती गंगा , निर्मल करती जाती थी ।
दर्शन परशन करते जो भी , उनका पुण्य बढ़ाती थी ।।
3 , पर यह मानव माँ गंगा को , मान नहीं वह दे पाया ।
निज कर्मो से माँ गंगा के , दामन में दाग़ लगाया ।।
बेटा कहलाने का हक़ तो , मानव ने खूब निभाया ।
देव नदी के पावन जल में , नालों का नीर बहाया ।।
4 , इसी तरह गंगा जल को हम , गंदा करते जाएंगे ।
फिर बोतल में भर गंगा जल ,घर को कैसे लाऐंगे ।।
अभी समय है चेत मनुज तू , वर्ना वह दिन आएगा ।
गंगा जल के दरश परश को तरस तरस रह जाएगा ।।
लोक नाथ तिवारी ``अनगढ़´´
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