सीमा


लावनी छंद - 16± 14
1- सीमा पर लड़ने को जो भी ,
आते मारे जाते हैं ।
छल बल जितना कर ले दुश्मन,
फिर भी मुँह की खाते हैं ।।
पार न पाते लड़ने से तो ,
नई राह अपनाते हैं ।
मेरे घर के गद्दारों को ,
टुकड़े फेंक नचाते हैं ।।
2- मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा में ,
भेद बढ़ाया जाता है ।
अफवाहें फैला कर इनको ,
रोज़ लड़ाया जाता है ।।
आपस में लड़वा कर इनको ,
मंद मंद मुसकाते हैं ।
मेरे घर ……
3 - कुछ लोग यहाँ पर ऐसे हैं ,
जो पैसों पर बिक जाते हैं ।
उसी थाली को छेदते हैं ,
ये जिस थाली में खाते हैं ।।
ऐसे लोगों को बहका कर ,
अपना काम बनाते हैं ।
मेरे घर ……
4 - शर्म नहीं आती है इनको ,
ओछी करनी करने पर ।
जिस मिट्टी में जन्म लिया है ,
उसको धोखा देने पर ।।
ये दुश्मन से मिलकर  मेरे ,
घर का भेद बताते हैं ।
मेरे घर ……
5 - तरस खाता हूँ मीडिया पर ,
जो इनको साहस देते ।
इन गद्दारों की करनी को ,
भी महिमा मंडित करते ।।
जहाँ कहीं भी मौका मिलता ,
राग विदेशी गाते हैं ।
मेरे घर ……
6 - बाहर के दुश्मन से पहले ,
निपटे धोखेबाज़ों से ।
शर्मसार है घर मेरा ये ,
घर के इन जल्लादों से ।।
इन जल्लादों की करनी से ,
दुश्मन मौज मनाते है ।
मेरे घर ……
7 - अभी समय है जागो वीरों ,
वर्ना वह दिन आएगा ।
सुन्दर सा यह देश हमारा ,
टुकड़ों में बँट जाएगा ।।
इन गद्दारों के बलबूते ,
बाहर वाले आते हैं ।
मेरे घर …………
× × × × × × × × ×

Comments