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🌹मर्यादा 🌹
मर्यादा कहते किसे नारी उसे जानती है ,
मुझको मर्यादा मेरी जान से भी प्यारी है ।
ये मेरी मर्यादा यदि साथ कभी छोड़ी है तो ,
इसका भी दोषी तो बिरादरी तुम्हारी है ।।
शक की निगाह से न कभी मुझे देखें आप ,
नारी पुरुषों की बेटी बहु महतारी है ।
धन , बल ,बुद्धि के प्रतीक जिसे मानते हैं ,
नर नहीं कोई वह तीनों ह़ी तो नारी है ।।
आप पाप करते हैं हम उसे भरते हैं ,
हँस न सकूँगी नहीं आँसू बह पाऐगें ।
कितना अनोखा धोखा देते दिन रात मुझे ,
चोरी करके आप इल्जाम भी लगाऐंगे ।।
शोषण करते हैं आप मुझे बदनाम भी ,
तलवार दुधारी कबतक चलाऐंगे ।।
आप यदि खुद को सुधार लें तो उसी दिन ,
धरती को देख देवता भी ललचाऐंगे ।।
मिली न निगाह यह बाँह पकड़ा न कोई ,
बोई गई बिरवा अबतक बचाई हूँ ।
काजल की कोठरी से वास्ता बहुत पड़ा
कड़ा अनुशासन अपना के बच पाई हूँ ।।
मेरे प्राणनाथ आप मुझपे विश्वास करें ,
अपना ये आँचल बेदाग लेके आई हूँ ।
शक करने से पूर्व "अनगढ़ "सोंच लें ,
अब तो मै आपके शरीर की परछाईं हूँ ।।
अनगढ़
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