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🌹🌹कविता की उपादेयता 🌹🌹
तमाशा जो ताज की है राज जो भी राज की है ,
सच जो समाज की है कहती है कविता ।
प्रेमियों का प्रेम भाव दुष्ट मन का दुराव ,
दुखियों का दुखी पाँव गहती है कविता ।।
संस्कृति नीति या अनीति की जब बात आए ,
सुनकर चुप नही रहती है कविता ।
नारी जो सताई जाए कविता न सह पाए ,
बनकर आँसू तब बहती है कविता ।।
श्रृंगार,हास्य,करुणा ,वीर ,बीभत्स, रौद्र ,
भयानक ,अद्भुत ,शांत रहती है कविता ।
प्रास ,अनुप्रास और छंद का लिबास लिए ,
कवियों के साथ साथ चलती है कविता ।।
प्रबंध बीच बंध के पहुँच के घर घर ,
भक्त भगवान को मिलाती है ये कविता ।
देशभक्ति भावना के शब्द को समेटकर ,
सोये हुए सिंह को जगाती है ये कविता ।।
महज मनोरंजन माने नहीं भूलकर ,
आपके दिमाग की खु़राक है ये कविता ।
मानवीय हाथों ने बनाया जो भी जग में ,
उन सबमें हसीन सौगात है ये कविता ।।
आँखों ने जो देखा उसे मन में उतारकर ,
कवियों के दिल की जज्बात है ये कविता ।
और कुछ रहता कभी न कवियों के पास ,
"अनगढ़ " की पूरी औकात है ये कविता ।।
अनगढ़
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