सावन


सावन आए पिया नहीं आए तो ,
 पिया पिया मैं पुकार रही हूँ ।
 भींग रहा तन मन मोरे प्यासे ,
 बारिस में तन जारि रही हूँ ।। 
का कहूँ बालम तोरै बिनु इस ,
 देह को भी न ,सँवारि रही हूँ ।
 पिया पिया रटते रटते इन ,
 आँखिन से लोर ढारि रही हूँ ।।

 बूँद अघात सुहात न मोहे , 
लागत हौ हियरा गड़ि जाई । 
बादर के टकराहट सुनि के  ,
 लागत हौ बिछुआ चढ़ि जाई ।।
 बिजुरी कै बोल कान पड़ै जब ,
 लागत हौ अँगिया टूटि जाई ।
 जीव सबै अँकवारि भरै देखि ,
लागत हौ सँसरी रुक जाई ।।

पिया बिनु जीया कैसे संभारु ये ,
बात पिया के हिया  न समाए ।
सावन बादर आई गयो सखि ,
मोरे पिया अबहूँ  नहीं आए ।।
मन मे निराशा हौ छायो हमारी ,
सावन आँखिन को बरसाए ।
सोच रही यही बात ये सावन ,
पिया बिनु कहीं बित न जाए ।।

अनगढ़

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