ससुराल


सभी सुख रात दिन सुलभ जहाँ रहता ,
    बहता हो रसधार वही ससुराल है ।
मेरे सुर में ससूर सुर जो मिलाया करें ,
     कहें कभी कुछ नही वही ससुराल है ।।
सास पास आए सिर्फ भोजन नाश्ता के लिए ,
     फिर कभी दिखे नही वही ससुराल है ।
सालियाँ अनेक हर उम्र कद काठी की हो , 
      गंध बरसाती जहाँ वही ससुराल है ।।

साला हल्ला करे नही पीछे कभी पड़े नही ,
     बाँह मेरी धरे नही वही ससुराल है ।
सरहज सहज भाव से हो जहाँ मिलती,
     खिलती हो देखकर वही ससुराल है ।।
सालियाँ पड़ोस की भी आके जहाँ कभी कभी,
      मन बहलाया करे वही ससुराल है ।
सालो भर मधुमास के समान सुखदायी ,
      "अनगढ़ "किस्मत में नही ससुराल है ।।

क्यो नही है इसका उत्तर 

मायके में पत्नी थी तो मन में विचार आया ,
     चलें ससुराल में ही कुछ दिन बिताऐंगे ।
सरल स्वभाव की है सासु मेरी माता जैसी ,
      उनके चरण छूकर आशीर्वाद पाऐंगे ।।
सरहज साथ हम करेंगे चुहलबाजी ,
     साली से आँख चार कर मन बहलाऐंगे ।
मुद्दतों के बाद मुझसे पत्नी मिलेगी तब ,
     रब जाने कैसे कैसे गुल हम खिलाऐंगे ।।

मन में ये ख्वाब लिए ससुराल पहुँचें तो ,
      साली देखते हीं उड़ने लगी आसमान में ।
सासु सरहज खुश कितना थी कैसे कहूँ ,
     मैं तो हो गया बेसुध पत्नी के मुस्कान में ।।
भोजनोपरांत रात जब गहराने लगी ,
     तो पंख लगने लगे थें मेरे अरमान में ।
सपना के सभी मोती क्षण में बिखर गए,
    सोने हेतु ससूर मुझे ले गए दालान में ।।

ससुरा हमारा खेल पल में बिगाड़ दिया ,
    सोंच कर के आया था कि इलू इलू गाऐंगे ।
अनेक अरमान लिए ससुराल आया था ,
       मुझे क्या पता था यहाँ आकर पछताऐंगे ।।
 "अनगढ़"अपमान इतना हुआ कि वहाँ ,
      खाई जो कसम उसे उम्र भर निभाऐंगे ।
दामाद को दालान में सुलाई जाती हो जहाँ ,
     वैसे ससुराल में हम कभी नही जाऐंगे ।।

अनगढ़
सभी सुख रात दिन सुलभ जहाँ रहता ,
    बहता हो रसधार वही ससुराल है ।
मेरे सुर में ससूर सुर जो मिलाया करें ,
     कहें कभी कुछ नही वही ससुराल है ।।
सास पास आए सिर्फ भोजन नाश्ता के लिए ,
     फिर कभी दिखे नही वही ससुराल है ।
सालियाँ अनेक हर उम्र कद काठी की हो , 
      गंध बरसाती जहाँ वही ससुराल है ।।

साला हल्ला करे नही पीछे कभी पड़े नही ,
     बाँह मेरी धरे नही वही ससुराल है ।
सरहज सहज भाव से हो जहाँ मिलती,
     खिलती हो देखकर वही ससुराल है ।।
सालियाँ पड़ोस की भी आके जहाँ कभी कभी,
      मन बहलाया करे वही ससुराल है ।
सालो भर मधुमास के समान सुखदायी ,
      "अनगढ़ "किस्मत में नही ससुराल है ।।

क्यो नही है इसका उत्तर 

मायके में पत्नी थी तो मन में विचार आया ,
     चलें ससुराल में ही कुछ दिन बिताऐंगे ।
सरल स्वभाव की है सासु मेरी माता जैसी ,
      उनके चरण छूकर आशीर्वाद पाऐंगे ।।
सरहज साथ हम करेंगे चुहलबाजी ,
     साली से आँख चार कर मन बहलाऐंगे ।
मुद्दतों के बाद मुझसे पत्नी मिलेगी तब ,
     रब जाने कैसे कैसे गुल हम खिलाऐंगे ।।

मन में ये ख्वाब लिए ससुराल पहुँचें तो ,
      साली देखते हीं उड़ने लगी आसमान में ।
सासु सरहज खुश कितना थी कैसे कहूँ ,
     मैं तो हो गया बेसुध पत्नी के मुस्कान में ।।
भोजनोपरांत रात जब गहराने लगी ,
     तो पंख लगने लगे थें मेरे अरमान में ।
सपना के सभी मोती क्षण में बिखर गए,
    सोने हेतु ससूर मुझे ले गए दालान में ।।

ससुरा हमारा खेल पल में बिगाड़ दिया ,
    सोंच कर के आया था कि इलू इलू गाऐंगे ।
अनेक अरमान लिए ससुराल आया था ,
       मुझे क्या पता था यहाँ आकर पछताऐंगे ।।
 "अनगढ़"अपमान इतना हुआ कि वहाँ ,
      खाई जो कसम उसे उम्र भर निभाऐंगे ।
दामाद को दालान में सुलाई जाती हो जहाँ ,
     वैसे ससुराल में हम कभी नही जाऐंगे ।।

अनगढ़

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