पत्नी प्रसंशा

जीवन संगिनी बनकर तू ,
 जिस दिन मेरे घर में थी पधारी ।
 घूँघट के पट के हटते मेरे ,
 आँखों पर छाने लगी अँधियारी ।
आँखें तरेरे थे नाक भी टेढ़े थे ,
 दाँतो से दिखती थी भूत की नारी ।
रात अमावश की फीकी पड़ी ,
जब दिख पड़ी तन ये कजरारी ।।
गहने दिखते ऐसे बदन पे , 
ज्यो बूटी संजीवनी काली पहाड़ी ।
तेरे रूप यौवन को कैसे बखानु ,
सूर्पनखा की तू है अवतारी।
त्वचा को तेरे छूते इन हाथों में , 
फैल गई अपरस की बीमारी ।
कैसे करुँ पाँव भारी तुम्हारी जो ,
तन हीं तुम्हारी है हाथी से भारी ।।
 अरमाँ थे दिल में समेटे हुए ,
    मिटने लगे वे सभी बारी बारी ।
    कोसते हैं उस दिन को हमारी , 
घर में तुम्हारी हुई ससुरारी ।।
कैसे कहुँ किस मुख से कहुँ ,
तन मन की दशा कैसी है हमारी ।
एक पत्नी तो वश में कर न सका ,
नाम तो है लोक नाथ तिवारी ।।
                                                   ---  अनगढ़

Comments